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कुरआन और हदीस प्रमाणिक है - इस्लाम एण्ड हिन्दुइज़्म
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दुनिया का यह मात्र अकेला ग्रन्थ है जो अपने पाठकगण को खोलते ही विश्वास दिलाता है कि तुम जो किताब पढ़ने जा रहे हो उस में कोई शक और संदेह नहीं।

क्या ऐसा नहीं है कि यदि आप के पास कोई सूचना पहुंचती है तो आप आँख बंद कर के उसे मान नहीं लेते बल्कि उसके स्रोत की प्रमाणिकता की ओर देखते हैं, यदि स्रोत प्रमाणिक (Authentic) है, तो उसे मानते हैं अन्यथा स्पष्ट रूप में उसे मानने से इंकार कर देते हैं, सांसारिक मामले में तो हम यह तथ्य मानते हैं लेकिन धार्मिक मामले में अफ़सोस कि हम इसे नहीं बरत पाते। हालांकि सांसारिक जीवन के जैसे धार्मिक जीवन का मामला भी होना चाहिए, जब ऊपर वाले ने हमें बुद्धि विवेक प्रदान किया है तो हमारी नैतिक ज़िम्मेदारी बनती है कि हम सांसारिक जीवन के जैसे धर्म को भी बौधिक दृष्टिकोण से देखकर उसकी सत्यता को जानने का प्रयास करें।

आज हर धर्म के मानने वाले यही दावा करते हैं कि सच्चाई मात्र उन्हीं के पास है। अब सही और ग़लत का फैसला कौन करेगा? हमारी बुद्धि भी कहती है कि धार्मिक ग्रन्थों की प्रमाणिकता देखी जाए ताकि सत्य और असत्य का फैसला हो सके।

हमें कहने दिया जाए कि इस धरती पर इस्लाम के अलावा जितने भी धर्म पाए जाते हैं किसी धर्म के Sources आज Authentic नहीं, क्यों कि वे हमारे मन में उभरने वाले महत्वपूर्ण प्रश्नों का संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाते, जैसे हर इंसान के मन में धार्मिक ग्रन्थों के प्रति यह प्रश्न उत्पन्न होते हैं कि वे कैसे उतरे ? किन पर उतरे ? कब उतरे ? कहाँ उतरे ? कितने दिनों में उतरे ? उनकी सूरक्षा कैसे हुई?  इन सारे सवालों का सही जवाब किसी धर्म के Sources नहीं दे सकते, लेकिन अगर आप इन सवालों के जवाब कुरआन से पूछिए जो इस्लाम का एक Source है तो वह आपको उनके बिल्कुल स्टीक और सनतोषजनक जवाब दे सकता है। हमें पता है कि क़ुरआन अल्लाह की वाणी है, आकाशीय दूत जिब्रील अलैहिस्सलाम द्वारा अन्तिम संदेष्टा मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर 23 वर्ष की अवधि में उतरा, यहाँ तक कि हमें यह भी पता है कि कौनसी सूरः और कौनसी आयत  किस संदेर्भ में उतरी और उसकी सुरक्षा के लिए अद्भूत नियम अपनाए गए।

फिर जब आप कुरआन खोलते हैं तो शुरू चैप्टर में ही कुरआन आपको विश्वास दिलाता है किः

الم ﴿١﴾ ذَٰلِكَ الْكِتَابُ لَا رَيْبَ ۛ فِيهِ

अलीफ़॰ लाम॰ मीम॰ (1) वह किताब यही है, जिसमें कोई सन्देह नहीं।

दुनिया का यह मात्र अकेला ग्रन्थ है जो अपने पाठकगण को खोलते ही विश्वास दिलाता है कि तुम जो किताब पढ़ने जा रहे हो उस में कोई शक और संदेह नहीं। वरना हर लेखक अपनी पुस्तक की भूमिका में पाठकगण से अनुरोध करता है कि पुस्तक में कोई त्रुटि हो तो हमें अवगत कराने का कष्ट करें ताकि अगले एडिशन में उन्हें सुधारा जा सके। इसी तथ्य पर चिंतन मनन के बाद कुछ बुद्धिजीवियों ने स्वीकार किया कि क़ुरआन ईश्वरीय ग्रन्थ है किसी इंसान का लिखा ग्रन्थ नहीं हो सकता।

कुरआन की सच्चाई इस से भी झलकती है कि कुरआन जिस सन्देष्टा पर उतरा वह बिल्कुल पवित्र इंसान थे, इतने सच्चे और अमानतदार कि लोगों ने उन्हें अस्सादिक़ “सत्य-वान” और अल-अमीन “भरोसेमंद” की उपाधि दे रखी थी। अब आप विचार कीजिए कि जो व्यक्ति लोगों के बीच सच्चाई और अमानतदारी से इतना प्रसिद्ध हो कि लोग उसे उसके नाम से पुकारने की बजाए अस्सादिक़ और अल-अमीन नाम से पुकारते हों, वैसा इंसान क्या अल्लाह पर झूठ बांधने का साहस कैसे करेगा? इंसानी बुद्धि इसे किसी प्रकार स्वीकार नहीं कर सकती।

बात यहीं पर समाप्त नहीं होती बल्कि न वह एक अक्षर पढ़ना जानते थे न लिखना जानते थे। अन्तिम ग्रंथ कुरआन को उतारने के लिए ऐसे व्यक्ति का चयन इस लिए किया गया ताकि किसी के मन में यह आभास न हो कि हो ना हो मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने ही इसे बनाया हो। यदि आपको विश्वास न आए तो मुहम्मद मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की बातों और कुरआन में तुलना कर के देख लीजिए, आपको दोनों शैली में आसमान और ज़मीन का अंतर देखाई देगा।

फिर “अल्लाह” ने कुरआन की सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी लेने के साथ उसकी शैली इतने उच्च कोटी की रखी कि हर कोई कुरआन के सन्देश को समझ सकता है परंतू उसकी शैली में एक श्लोक भी बना पाना उसके बस की बात नहीं। यह कुरआन का सबसे बड़ा चमत्कार है। कुरआन ने दसियों स्थान पर सारी मानवता को चुनौती दी कि कोई है जो कुरआन की शैली में उसके जैसे तो क्या, दस सूरतें तो क्या, एक सूरतें तो क्या, एक आयत ही बनाकर पेश कर दे। यह चुनौती थी अरबों को जो अपनी भाषा पर गर्व करते थे। आज तक यह चुनौती बाकी है लेकिन उस समय से लेकर अब तक अरबी का कोई ऐसा विद्वान पैदा न हो सका जो कुरआन की शैली में एक श्लोक ही बनाकर पेश कर दे। यह खुला प्रमाण है कि कुरआन अल्लाह की वाणी है।

हम केवल कुरआन की सुरक्षा की बात नहीं करते बल्कि इस्लाम का दूसरा स्रोत जो हदीस कहलाता है अर्थात मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के प्रवचन जो वास्तव में कुरआन की व्याख्या है, वह भी आज सुरक्षित है। इस्लाम सारी मानवता के लिए था और रहती दुनिया तक के लिए, इस लिए जरूरत थी कि कुरआन ही सूरक्षित न रहे बल्कि मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जो व्यवहार की भाषा में कुरआन का अनुवाद थे उनकी जीवनी भी प्रमाणित रूप में सुरक्षित कर दी जाए, उनके प्रवचन भी पूरी सतर्कता से सुरक्षित कर दिए जाएं, अतः मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की जीवनी जन्म से लेकर चालीस वर्ष तक बिल्कुल सुरक्षित है, फिर जब आप चालीस वर्ष में नबी बनाए गये तो नबी बनने से लेकर अन्तिम क्षण तक जो कुछ किया और बोला, उसकी सुरक्षा के अद्भूत तरीक़े अपनाए गए। आपने सहाबा जब आप से हदीस सुनने तो उन्हें श्रद्धा से उसी समय याद कर लेते और कुछ लोग उन्हें लिख लेते, फिर बाद के लोगों तक पहुंचाते जिनकी संख्या लाखों तक पहुंचती है, फिर सुनने वाले दूसरों को सुनाते यहाँ तक कि उन्हें लिख दिया गया। उदाहरण के रूप में अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की हदीसें वर्णित करने वाले विद्वान जिन्हें मुहद्दिस कहा जाता है जब उन्होंने मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की हदीसों को एकत्र किया तो हर हदीस को बयान करते हुए वह कहते हैं कि मैंने फ़लाँ से सुना, या मुझ से फ़लाँ ने वर्णित किया, फ़लाँ से फ़लाँ ने कहा, और फलाँ से फ़लाँ ने कहा कि मैंने अपने कानों से मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को यह कहते हुए सुना है। जिन लोगों द्वारा यह प्रवचन हम तक पहुंचते हैं उन्हें रावी कहते हैं। इतिहासकारों ने उन रावियों की पूरी जीवनी लिखी है, इसके लिए मुसलमानों ने एक विषय बनाया जिसका नाम अस्मा-उर्रिजाल है, इस विषय में पाँच लाख से अधिक इंसानों की जीवनियाँ सुरक्षित हैं, अगर उनमें कोई झूठ बोलते हुए पाया गया, या उनकी स्मरण-शक्ति कमज़ोर थी उनके द्वारा वर्णित प्रवचनों को अस्वीकार कर दिया गया। यह श्रेय केवल मुसलमानों को प्राप्त है कि उनका ग्रंथ ही नहीं बल्कि उनके सन्देष्टा की जीवनी और उनकी बातें भी आज प्रमाणित रूप में सुरक्षित हैं।

एक व्यक्ति जब इस्लाम का अध्ययन करते हुए इस विषय पर पहुंचता है तो दंग रह जाता है कि इस्लाम के धार्मिक सोर्सेज़ की सुरक्षा हेतु कितना प्रबंध किया गया। प्रसिद्ध जर्मन डॉक्टर स्परैंगर जो अंग्रेजों के ज़माने में बंगाल एशिया टिक सोसायटी का सचिव था, सहाबा की पवित्र जीवनी से संबंधित किताब अल-इसाबा फी तम्ईज़िस्सहाबा लेखक इमाम इब्ने हजर उसी के युग में कलकत्ता से प्रकाशित हुई, उसकी अंग्रेजी भूमिका में डॉक्टर स्परैंगर कहता है। “कोई क़ौम दुनिया में ऐसी नहीं गुज़री न आज मौजूद है जिसने मुसलमानों की तरह अस्माउर्रिजाल का महान सब्जेक्ट जारी किया हो, जिसके कारण आज पांच लाख लोगों का हाल मालूम हो सकता है”।

 

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